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जागृति कार्यक्रम

Thursday, May 17, 2018

વૃક્ષારોપણ

યુનાઈટેડ નેશન્સના તાજેતરના રિપોર્ટ અનુસાર વિશ્વમાં , પ્રતિ નાગરિક વ્રુક્ષોની સંખ્યા નીચે મુજબ છે:
      કેનેડા      : ૮૯૫૩
      રશિયા     : ૪૪૬૧
      અમેરિકા   :   ૭૧૬ 
       ચીન       :    ૧૦૨
       ભારત     :      ૨૮
આપણા દેશમાં, પ્રતિ નાગરિક વ્રુક્ષની સંખ્યા વિશ્વમાં સૌથી ઓછી છે.
દર પાંચ વર્ષે આપણા દેશમાં વાતાવરણમાં ૧ સે. ડિગ્રી ગરમીનું પ્રમાણ વધી રહ્યું છે, જે લગભગ ૪૫ અંશ સે. ડિગ્રી સુધી પહોંચી ગયું છે. આ ઘણી ચિંતાજનક બાબત છે. 
આવનારા ચોમાસામાં આપણે સહુ એ ઓછમાં ઓછા પાંચ (૫) વ્રુક્ષ ઉછેરવાની જવાબદારી લેવી જોઈએ. આ ચેલેન્જ આપણે ઉપાડી શકીશું?
મહેરબાની કરીને આ સંદેશો વધુ ને વધુ લોકોને મોકલો.

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Friday, March 30, 2018

Saturday, April 1, 2017

वृक्षों का आध्यात्मिक महत्व

  
मनुष्य जीवन में वृक्षों का आध्यात्मिक महत्व
अखण्ड ज्योति Aug 1966 

बहुत समय से हम भारतवासी वनों एवं वृक्षों का महत्व भूल गये हैं। हमारे देश की समग्र सभ्यता, संस्कृति, धर्म एवं अध्यात्म-दर्शन का विकास वनों में वृक्षों, के नीचे ही हुआ है। हम सब वैदिक सभ्यता के अनुयायी हैं, और हमारा धर्म भी वैदिक ही है।

इस वैदिक धर्म एवं वैदिक सभ्यता के प्रणेता ऋषि मुनियों ने वनों के बीच वृक्षों के नीचे बैठकर ही चिन्तन, मनन एवं ग्रहण किया था। वैदिक ज्ञान के वाँग्मय में आरण्यक ग्रन्थों का विशेष स्थान है। ग्रन्थों का यह आरण्यक नाम ही इस बात का द्योतक है कि इनका प्रणयन वनों में ही किया गया है। अरण्य का अर्थ वन ही होता है।

जिन वृक्षों के नीचे बैठकर ऋषियों ने ईश्वरीय ज्ञान की प्राप्ति की और हमारे सामाजिक जीवन की रूप-रेखा बनाई, वन के बीच बने आश्रमों के जिन वृक्षों के नीचे गुरुकुलों में राष्ट्र के कर्णधारों, राजाओं, अमात्यों, राज गुरुओं, सेनापतियों, राजनीतिज्ञों, विद्वानों, कवियों, दार्शनिकों एवं कलाकारों का निर्माण किया गया, जो वृक्ष उन गुरुकुलों की भोजन व्यवस्था, छाया तथा निर्माण-सामग्री के साधक बने, उन वृक्षों के महत्व का विस्मरण कर देना हम भारत-वासियों के लिये कृतघ्नता के समान पाप है। वृक्षों के पूजन एवं आरोपण की जो पुण्य परम्परा भारतीय धर्म-विधान में पाई जाती है वह वृक्षों के प्रति कृतज्ञता की अभिव्यक्ति ही है।

इस परम्परा को चलाने में ऋषियों का उद्देश्य यह रहा है कि जनसाधारण धर्माचार के माध्यम से वृक्षों के संपर्क में आता रहे जिससे उनके लाभ उनकी उपयोगिता, उनके महत्व एवं उनके उपकार से अवगत रहे। उनकी रक्षा करे और उनके उच्छेद करने को पाप समझता रहे।

किन्तु खेद है कि ऋषियों का यह मन्तव्य आज लीक मात्र पीटने के रूप में रह गया है। वृक्ष पूजा के मूल मन्तव्य को पूरी तरह भुला दिया गया है। अब तो लोगों का दुःसाहस यहाँ तक बढ़ गया है कि जिन वृक्षों की पूजा करते हैं, जिन पर जल एवं चन्दन रोली चढ़ाते हैं, जिनको सूत्र दान करते और हाथ जोड़कर प्रदक्षिणा करते हैं, उन्हें थोड़े से स्वार्थ के लिये काट तक डालते हैं। वृक्षों के प्रति भारतीयों की यह अधार्मिक बुद्धि सोच का विषय है।

पं. नेहरू का पुस्तक प्रेम -

पंडित नेहरू को पुस्तकों से बहुत प्रेम था। वे पुस्तकों को इतना सँभाल कर रखते थे कि वर्षों नई बनी रहती थी। एक बार लखनऊ में वे अपने एक मित्र श्री मोहनलाल सक्सेना के यहाँ ठहरे। स्वभाव के अनुसार उनकी नजर उनकी पुस्तकों की अलमारी पर गई। अलमारी में पुस्तकें बहुत ही बेतरतीब और उल्टी-सीधी पड़ी हुई थीं। उन पर धूल भी जम रही थी।

वे उठे और अलमारी की सारी पुस्तकें निकाली और झाड़-पोंछकर उन्हें तरीके और तरतीब से लगाते हुये, अपने मित्र से नाराजगी के साथ कहने लगे—"क्यों मोहनलाल! क्या तुम यह नहीं मानते कि पुस्तकें जीवित वस्तु हैं। इनका सदा ही आदर सम्मान करना चाहिये। पुस्तकों के साथ इस प्रकार से दुर्व्यवहार करना शोभनीय बात नहीं।"

आज संसार में सबसे अधिक वृक्ष भारतवर्ष में ही काटे जाते हैं। चकबन्दी की चर्चा होते ही बाग के बाग साफ कर दिये गये हैं, जंगल के जंगल काटकर गिरा दिए गये हैं और नित्य प्रति गिराये जा रहे हैं। वृक्षों के प्रति भारतीयों की यह निर्दयता अशोभनीय है। जीवों की भाँति ही वृक्षों पर भी दया करनी चाहिए। हरे वृक्षों को काटना न केवल वनस्पति के रूप में देश की सम्पत्ति को हानि पहुँचाना है, अपितु यह जीव हत्या के समान एक पाप भी है।

यदि जड़ जीवन की बात छोड़ भी दी जाये तो भी संसार का अनन्त उपकार करने वाले वृक्षों का ह्रास करना मानव-समाज ही नहीं सम्पूर्ण जीव-जगत को हानि पहुँचाना है। यदि एक बार वृक्षों को जड़ भी मान लिया जाये तब भी यह सोच सकने का अवसर है कि जड़ होकर भी वृक्ष संसार का कितना उपकार करते हैं और हम चेतन होकर भी उस अनबोल उपकारी पर कुल्हाड़ी चलाते हैं।

वृक्षों को काटने अथवा नष्ट करने वालों की तुलना दुष्ट तथा क्रूर पक्षी बाज से की गई है, जो सुकुमार पक्षियों को मार डालता है। वेद के ऋषि ने कहा है —

मा का कम्बीर मुहृ हो वनस्पतिन शस्तीर्वि हिनीनशः। मोत सूरो अह एवा चन ग्रीवा अदधते वेः॥

अर्थात् - जिस प्रकार दुष्ट बाज पक्षी दूसरे पक्षियों की गर्दन तोड़कर उन्हें कष्ट पहुँचाता और मार डालता है, तुम उस प्रकार के न बनो। इन वृक्षों को कष्ट न दो और न इन्हें काटो ही क्योंकि यह वृक्ष पशु-पक्षियों तथा अन्य जीव जन्तुओं को शरण देते हैं।

आध्यात्मिक उन्नति के लिये मनुष्य का स्वयं परोपकारी होना और किसी परोपकारी के प्रति आदर भाव रखना, श्रद्धा करना अथवा उसकी रक्षा करना भी परोपकार ही है और यदि विचारपूर्वक देखा जावे तो पता चलेगा कि किसी की सेवा करना, भला अथवा सहायता करना एकधा परोपकार करना है, किन्तु किसी परोपकारी, समाज सेवी, दानी, दयालु आदि परमार्थी व्यक्तियों के प्रति श्रद्धा रखना, आपत्ति के समय उनकी रक्षा में सहायक होना, उनके पुण्य कार्यों में सहयोग करना द्विधा परोपकार है। एक तो व्यक्ति का पोषण, परिवर्धन, रक्षा करना, परोक्ष रूप में उन सब लोगों की सेवा सहायता में मूल परोपकारी के माध्यम से भागीदार बनना है।

इस द्विधा परोपकार का पुण्यफल पाने के लिये मनुष्यों को वृक्ष जैसे निःस्वार्थ परोपकारी की हर प्रकार से सेवा, सहायता तथा सुरक्षा करनी चाहिए। वृक्षों के परोपकार का यदि लेखा-जोखा लिया जाये तो पता चलेगा कि जीव जन्तुओं तथा पक्षियों को शरण तथा भोजन-वास देने के अतिरिक्त वृक्ष मनुष्य जीवन के प्रायः सभी क्षेत्रों में किसी न किसी रूप में उपयोगी होते हैं। छाया, फल-फूल, ईंधन, कोयला, इमारती लकड़ी, गंध औषधियाँ, गोंद, लाख, राल, शहद आदि न जाने जीवनोपयोगी कितनी चीजें वृक्षों से ही पाई जाती हैं। मेवे, मसाले आदि सब वृक्षों से ही मिलते हैं। अब तो कागज एवं कपड़ा भी वृक्षों के गूदे, छाल, पत्तियों तथा रेशों से बनने लगा है। हल से लेकर खुरपी तक और बैलगाड़ी से लेकर हवाई जहाज तक के निर्माण में वृक्षों से प्राप्त होने वाली लकड़ी का विशेष स्थान है।

धार्मिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्र में उपयोग होने वाली अधिकाँश वस्तुयें काठ की ही बनती हैं। यज्ञ के उपकरण, उपादान तथा सामग्री वृक्षों की सहायता से ही उपलब्ध की जाती हैं। प्राण-रक्षक ऑक्सीजन गैस का देना और घातक गैस कार्बन डायऑक्साइड गैस का शोषण करना वृक्षों का ही पुण्य कार्य है। यदि ऐसा न हो तो पृथ्वी पर प्राणियों का जीवन असम्भव हो जाये। वृक्ष मेघों के बनने और बरसने में किस सीमा तक सहायक होते हैं इस सत्य को विज्ञान का बाल-विद्यार्थी तक जानता है। जंगल न केवल बाढ़ रोकने के ही पुण्य कार्य का सम्पादन करते हैं बल्कि वे धरती के क्षरण तथा मरु वर्धन को भी रोकते हैं। पृथ्वी की उर्वरा शक्ति में वृक्ष अनेक प्रकार से सहायक होते हैं। उनसे उपकारी वृक्षों को पालना, उनकी रक्षा करना तथा उनको लगाना कितना महान पुण्य हो सकता है और इनका काटना तथा उजाड़ना कितना जघन्त पाप हो सकता है इसको कोई भी आध्यात्मिक उन्नति का आकाँक्षी व्यक्ति सहज ही में समझ सकता है। प्राणीमात्र के परमोपकारी वृक्षों को पाल पोस तथा आरोपण करके अध्यात्म दिशा में उल्लेखनीय लाभ उठाया जा सकता है।

पूर्वकाल में गुरु-आश्रम तथा गुरुकुल, में वन वृक्षों के बीच की स्थापित किये जाते थे। विद्यार्थी स्वयं अपने हाथों से वृक्षों को लगाते तथा सींचते थे। उन्हीं के नीचे बैठकर पढ़ते तथा उन्हीं की छाया में शयन भी करते थे। ऐसे नियम का कारण यही था कि जहाँ इस प्रकार वे प्रकृति के संसर्ग में रहकर मन, बुद्धि तथा आत्मा से शुद्ध रहते थे वहाँ शरीर से स्वस्थ भी रहते थे। वृक्ष साधकों की आध्यात्मिक भावनाएँ जगाने, बढ़ाने तथा स्थिर रखने में स्वाभाविक रूप से सहायक होते थे। यही कारण है कि उन-दिन वृक्षों के बीच स्थापित गुरुकुलों से पढ़कर निकलने वाले स्नातक एवं आचार्य बड़े ही स्वस्थ सुन्दर, सबल, विद्वान तथा चरित्रवान होते थे। अरण्य विद्यालयों में शिक्षित एवं दीक्षित विद्यार्थी काम, क्रोध, मोह, लोभ आदि किसी प्रकार के विचारों से आजीवन परास्त न होते थे। वृक्षों का यह उपयोगी आध्यात्मिक महत्व आज भी कम नहीं है। उनके उन दिव्य गुणों में किसी प्रकार की कमी नहीं आई है। आज भी विद्यालयों, गृहों तथा धार्मिक स्थानों को यथासम्भव हरे भरे वृक्षों से संकुल रखने का प्रयत्न किया जाता है। कमी केवल यह हो गई है मनुष्य ने वृक्षों के इस आध्यात्मिक महत्व को भुला दिया है। वह उन्हें और अधिक पालने-पोषने तथा लगाने में पुनःप्रवृत्त हो जाये तो वनस्पति के अधिकाधिक संपर्क मात्र से ही वह न जाने कितना आध्यात्मिक लाभ उठालें।

फूलों फलों एवं हरीतिमा से भरी हुई वृक्षावली मनुष्य की सौंदर्य चेतना को उद्बुद्ध करने में सबसे अधिक सफल सहायक है। संसार का सारा सौंदर्य प्रकृति की सुन्दरता का ही प्रतिबिम्ब है। जिस समय फली फूली एवं रंग-बिरंगी प्रकृति पर मनुष्य की दृष्टि पड़ती है, उस समय उसकी आत्मा में जो सात्विक सौन्दर्यानुभूति होती है वह आध्यात्मिक अनुभूति ही होती है। उस समय उसके प्राणों में स्वयं परमात्मा ही सौंदर्य बोध में प्रबुद्ध हुआ करता है। निःसन्देह, यदि मनुष्य की वह सौन्दर्यानुभूति स्थायी हो जाये तो उसकी पावन पुलक उसे जीवनमुक्त ही बना दे। प्राकृतिक सौंदर्य जहाँ मनुष्य को प्रसन्न बनाता है वहाँ उसके मन, बुद्धि
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वृक्षों की उपयोगिता

वृक्षों की उपयोगिता
पाठकों, ये तो आप सभी जानते हो कि वृक्ष हमारे जीवन के लिए बहुत उपयोगी होता है। जहाँ वृक्ष होते हैँ वहाँ का प्राकृतिक वातावरण अलग ही होता है। वृक्ष होने पर वातावरण शुद्ध होता है। ये हमारे द्वारा छोङी गई कार्बन-डाई-ऑक्साईड गैस को ग्रहण करते हैं और ऑक्सीजन गैस छोङते हैं। सोचो, अगर वृक्ष ना हो तो हमारे द्वारा छोङी गई कार्बन-डाई-ऑक्साईड को कौन ग्रहण करेगा? पूरे वातावरण में जब कार्बन-डाइ-ऑक्साइड फैल जाएगी तो हमारे लिए सांस लेना मुश्किल हो जाएगा और हम मर जाएँगे। मानसून भी वृक्षों पर ही निर्भर करता है। जहाँ ज्यादा मात्रा में वृक्ष होते हैं वहाँ बरसात भी ज्यादा होती है और जहाँ कम मात्रा मेँ वृक्ष होते हैं वहाँ बरसात भी कम होती है। वृक्षों से बहुत सी जीवनोपयोगी वस्तुएँ मिलती हैं, जैसे – इमारती लकङी, जलावन, चारा, फर्निचर, फल, औषधि, छाया आदि। वृक्षों से ही पर्यावरण का निर्माण होता है। पहले हर गाँव के आस पास जंगल होता था और उसी जंगल को बचाने के लिए बहुत मशक्कत करनी पङती है। जिनके कंधों के ऊपर जंगलों को बचाने की जिम्मेदारी सौंपी गयी है वे ही जँगलों को कटवाने में सहायक हो रहे हैँ।
जंगलों की कटाई करके वहाँ उद्योग धन्धे लगाये जा रहे हैं, खदानें खोदी जा रही हैं, रेलमार्ग व सङक मार्ग विकसित किए जा रहे हैं। ज्यादा खेती योग्य भूमि बनाने के लिए वृक्षों की कटाई की जा रही है। जलावन व फर्निचर के लिए अन्धाधुंध वृक्ष काटे जा रहे हैं लेकिन उनके बदले कोई भी एक वृक्ष लगाने को तैयार नहीं है। किसी को मारना बहुत आसान होता है पर किसी पालना बहुत मुश्किल होता है, इसीलिए लोग वृक्षों को काट तो लेते हैं पर उसकी जगह एक वृक्ष लगा नहीं सकते।
आज शहरों में जिस तरह से निर्माण कार्य चल रहा है उससे प्रकृति को नुकसान ही हो रहा है। आधुनिक विकास की नींव प्रकृति के विनाश पर ही रखी जाती है। बङी-बङी इमारतें बनाने के लिए खेती की जमीन का इस्तेमाल किया जा रहा है जिससे वहाँ खङे पेङ-पौधे भी काटे जा रहे हैं।
अब शहरों में लोग अपने-अपने घरों में गमलों में छोटे पौधे लगा रहे हैं। लेकिन इन छोटे पौधों से क्या होता है। छोटे पौधे सिर्फ सजावट कर सकते हैं पर आपके स्वास्थ्य की रक्षा नहीं कर सकते। आज आम शहरियों में बङी बङी बिमारियाँ घर कर गई हैं जो पर्यावरणीय नुकसान के कारण ही है। जब हमें स्वच्छ प्राण वायु नहीं मिलेगी तो बिमारी तो लगेगी ही।
बरसों पहले राजस्थान के खेजङली गाँव में पेङों को ठेकेदारों से बचाने के लिए गाँव वालों नें पेङों के साथ लिपटकर अपनी कुर्बानी दी थी। आज सिर्फ वही विश्नोई समाज पेङों के संरक्षण की बात करता है, बाकि को इससे कोई मतलब नहीं है। पेङ कटे या बचे पर उनका विकास होना चाहिए।
हमारे प्राचीन मनीषियों नें भी पेङों के संरक्षण की पुरजोर वकालत की है। हमारे प्राचीन विद्वान इस बात को जानते थे कि वृक्षों के बिना जीवन संभव नहीं है। तभी तो उन्होंने हमारे जीवन में हर व्रत या पर्वों को वृक्षों से जोङा है।
वृक्ष के महत्त्व को बताते हुए मत्स्यमहापुराण में एक कथा आती है। जब शिव-पार्वती का विवाह हुआ था तब बहुत दिनों तक शिव-पार्वती का समागम नहीं होने के कारण पार्वती जी को कोई सन्तान नहीं हुई। इस कारण माता पार्वती तरह-तरह के बच्चों के खिलौने बनाकर खेला करती थी। पहले उन्होंने गजमुख की आकृति वाले बच्चे का निर्माण अपने शरीर के मैल से किया। फिर इसमें प्राण डालकर ब्रह्मा जी नें इसे गजानन या गणेश का नाम दिया। फिर उन्होंने वृक्ष के पत्तों को पीसकर उसका एक खिलोना बनाकर उससे खेलने लगी तो ब्रह्म ऋषियों नें आकर कहा कि-'हे माता! आप ये कर रही हैं? आपको तारकासुर का वध करने के लिए बलशाली बच्चा उत्पन्न करना था और आप यहाँ खिलौने बनाकर खेल रही हैं।'
तब पार्वती जी नें उनसे कहा कि –

एवं निरुदके देशे यः कूपं कारयेद् बुधः।
बिन्दौ बिन्दौ च तोयस्य वसेत् संवत्सरं दिवि।। (511)
दशकूपसमा वापी दशवापीसमो ह्रदः।
दशह्रदसमः पुत्रो दशपुत्रो समो द्रुमः।।
एषैव मम् मर्यादा नियता लोक भावनी।। (512)

अर्थात् – 'हे विप्रवरों। इस प्रकार के जल रहित प्रदेश (कैलाश) में जो बुद्धिमान पुरुष कुआँ बनवाता है, वह कुएँ के जल के एक-एक बूँद के बराबर वर्षों तक निवास करता है। इस प्रकार दस कुएँ के समान एक बावङी, दस बावङी के सदृश एक सरोवर, दस सरोवर की तुलना में एक पुत्र और दस पुत्रों की तुलना में एक वृक्ष माना गया है। यही लोकों का कल्याण करने वाली मर्यादा है, जिसे मैं निर्धारित कर रही हूँ। (मत्स्यपुराण-अध्याय 152, श्लोक 511 व 512)

इस प्रकार एक वृक्ष को दस पुत्रों के समान बताया गया है। यानि जितना पुण्य दस पुत्रों को उत्पन्न करने पर होता है उतना ही पुण्य एक वृक्ष लगाने पर होता है। हम अगर किसी वस्तु का सिर्फ उपभोग करेंगे लेकिन उसका निर्माण नहीं करेंगे तो निश्चित है कि एक दिन वो वस्तु नष्ट हो जाती है।
इस विषय में सरकार भी सख्त कदम नहीं उठाती है। क्योंकि जो लोग वृक्षों को कटवाते हैं वे या तो बङे उद्योगपति होते हैं या खुद नेता होते हैं। आज जरुरत है हर आम आदमी के जागरुक होने की क्योंकि जब तक आम आदमी जागरुक नहीं होगा तब तक वृक्षों की कटाई इसी तरह चलती रहेगी। अगर हर व्यक्ति ये संकल्प कर ले कि एक हरे पेङ को काटने पर चार पेङ और एक सूखे पेङ को काटने पर दो हरे पेङ लगाने हैं, तो ये समस्या आएगी ही नहीं। जहाँ तक हो सके वहाँ तक खेतों से हरे पेङ नहीं काटने चाहिए। अपने घर के अन्दर या बाहर ज्यादा से ज्यादा बङे पेङ लगाने चाहिए ताकि आपको स्वच्छ प्राण वायु मिल सकें। दिन में अगर आप पेङ की छाया में सोएंगे तो आपको स्वच्छ प्राणवायु मिलेगी व आपका शरीर भी तरोताजा हो जाता है। अगर हर व्यक्ति ये संकल्प कर ले कि मुझे सङक किनारे दो पेङ लगाने हैं तो कोई भी सङक बिना पेङों के नहीं रहेगी और पर्यावरण प्रदूषण से भी निजात मिल सकेगी। जितने ज्यादा पेङ आपके क्षेत्र में होंगे उतनी ही ज्यादा बरसात आपके क्षेत्र में होगी।
इसलिए अधिक से अधिक पेङ लगाएँ।
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